कोटा: शराब के नशे में कांस्टेबल ने फोन पर युवक को धमकाया, ऑडियो वायरल हुआ तो एसपी ने किया लाइन हाजिर

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दीपेश गुबरानी@कोटा। आमजन की रक्षक होने का दावा करने वाली पुलिस ही जब जनता के लिए भक्षक साबित हो जाएं तो भला कानून पर कैसे भरोसा किया जाएं। ऐसा ही एक मामला शहर के उघोग नगर थाने में तैनात कांस्टेबल से जुड़ा हैं। जिसने शराब के नशे में एक युवक से फोन पर अभद्र भाषा में बात करते हुए ना सिर्फ बदसलूकी की बल्कि गाली-गलौच करते हुए जान से मारने की धमकी भी दी। युवक की शिकायत पर एसपी ने ऑडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर कांस्टेबल को तुरंत लाईन हाजिर कर दिया।

जानकारी के अनुसार उघोग नगर थाना क्षेत्र के प्रेम नगर निवासी महावीर पंडित ने बताया कि कुछ दिन पूर्व पड़ोसी महिला के घर के बाहर वाहन खड़ा करने की शिकायत पर कांस्टेबल लोकेश चौधरी का उसके पास फोन आया था। जिसमें उसने फरियादी महिला संगीता की शिकायत का हवाला देते हुए कार्यवाही करने की बात कहकर सख्त हिदायत दी, युवक का कहना हैं फिर चार दिन बात कांस्टेबल लोकेश कुमार ने उसी मामले में फोन किया और वह शराब के नशे में फोन पर अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए गाली-गलौच करने लगा और मारकर ठिकाने लगाने की धमकी देने लगा।

वही, पीडित महावीर पंडित के फोन मे मौजूद 23 मिनट की ऑडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर वह कांस्टेबल से भाई साहब-भाई साहब करकर बात करता रहा लेकिन नशे में धूत लोकेश चौधरी निरन्तर गाली-गलौच करता हुआ धमकाता हैं। जब युवक ने मामले की शिकायत पुलिस अधीक्षक दीपक भार्गव को दी तो ऑडियो रिकॉर्डिंग सुनने के बाद कांस्टेबल को लाईन हाजिर कर दिया गया, वहीं अब पुलिस इस मामले की जांच में जुटी हैं। वही, इस ऑडियो रिकॉर्डिंग के सोशल मीडिया पर भी शहरभर में यह मामला चर्चा का विषय बना गया हैं साथ ही पुलिस के इस रवैये से आमजन खफा हैं।

लाइन-हाजिर का मतलब कोई सजा नही हैं ?

लोग यही समझते हैं कि संबंधित दरोगा या सिपाही को उसकी करतूत की सजा मिल गई मगर हकीकत इससे परे है। सच यह है कि ‘लाइन हाजिर’ पुलिस नियमावली में कोई कार्रवाई ही नहीं है। लाइन हाजिर का मतलब है पुलिस लाइन में स्थानांतरण। बस इससे ज्यादा कुछ नहीं। यह वैसा ही है जैसे एक थाने से दूसरे थाने, एक चौकी से दूसरी चौकी तबादला हो या फिर एक जिम्मेदारी से दूसरी जिम्मेदारी सौंप दी जाए।

पुलिस नियम में निलंबन के पहले कोई कार्रवाई नहीं मानी जाती। निलंबन के बाद ही जांच होती है। जांच की रिपोर्ट पर मुहर लगती है और पुष्टि की जाती है कि निलंबन का आधार क्या था? इसी पर अपील होती है। थानेदार, दरोगा या सिपाही को कप्तान ने निलंबित किया तो अपील सुनने की अथॉरिटी डीआईजी हैं। डीआईजी के बाद आईजी।

वहां से खारिज हुई तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाना ही पुलिसकर्मियों का विकल्प है। खास बात यह कि यह कार्रवाई संबंधित पुलिसकर्मी की चरित्र पंजिका में दर्ज होती है। यानी सीआर खराब होने का भी संकट खड़ा होता है। किसी बड़े मामले में भी घोषणा यह होती है कि किसी को लाइन हाजिर कर दिया गया और जब प्रकरण ठंडा पड़ जाए तो लाइन से फिर किसी थाने में तबादला कर दिया जाता है।

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